संयोग


एक खूबसूरत , मगर अजनबी

हवा का झोंका 

जेठ की दुपहरी में

अपनी महक और शीतलता से 

मुझे महका रहा था।

एक स्मित हास्य और 

प्रश्नांकित आंखों से 

यह शीतल किंतु चंचल समीर 

कुछ असहज, कुछ अनमना

कुछ अनिश्चित सा 

बहा जा रहा था।

एक मनमीत से मिलन 

की आस और 

मन की बात बांट लेने 

का एहसास

तन मन को कसका रहा था।

ये महज़ संयोग था

या फिर

एक खूबसूरत, मगर नामुमकिन

और अनकहे रिश्ते

की बुनियाद का योग था।